भारमुक्त और आभारयुक्त जीवन की ओर

गौरव अवस्थी


वर्ष 1995 था| हम अमर उजाला कानपुर में हजार रुपए मानदेय वाले पत्रकार थे| लखनऊ से हिंदुस्तान के प्रकाशन की चर्चा तेजी पकड़ती जा रही थी| वेतन भोगी पत्रकार बनने के लिए मैं भी हिंदुस्तान की लाइन में लगा| माध्यम बने श्री संजीव त्रिपाठी| हिंदुस्तान लखनऊ के संस्थापक संपादक श्री सुनील दुबे जी (अब दिवंगत) उनकी मौसी के लड़के थे| महीना ठीक से याद नहीं | जुलाई-अगस्त ही रहा होगा| भइया नीरज अवस्थी (स्मृति शेष) से resume ( तब बायोडाटा बोला जाता था) तैयार कराकर भेजा| अमर उजाला कानपुर के कई वरिष्ठ लोगों के साथ ही अपना भी बुलव्वा आया| बुलावे पर ही बल्लियों उछले| खुशी तो पूछो ही मत|

ओरिजिनल डॉक्यूमेंट लेकर हिंदुस्तान के लखनऊ मुख्यालय पहुंचे| तब हिंदुस्तान कृषि भवन के पास अशोक मार्ग पर हुआ करता था| अब मंडी परिषद के नजदीक गोमतीनगर में| अपने समय में हिंदुस्तान टाइम्स की वह बिल्डिंग आलीशान मानी जाती थी| हिंदुस्तान टाइम्स के कार्यकारी अध्यक्ष श्री नरेश मोहन जी इंटरव्यू लेने आए थे| संभवत: दूसरा राउंड था| इंटरव्यू के लिए कोई दो दर्जन लोग तो रहे ही होंगे| दुबे जी ने ही सबकी अटेंडेंस ली| बारी पर सब आ-जा रहे थे| हम भी वेटिंग में थे|

इंटरव्यू नाम की चिड़िया से अपना पहला साबका ही था| इंटरव्यू वह भी नेशनल मीडिया हाउस के कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा| धुकधुकी तेज तो होनी ही थी| थी भी| आवाज आई- ‘गौरव अवस्थी’| कागज-पत्तर वाली फाइल संभालते हुए हम नरेश मोहन जी के सामने| सिट्टीऺ-पिट्टी गुम| बैठिए..सकुचाते-सकुचाते सामने की कुर्सी पर बैठे| बायोडाटा उनके हाथ में और कागजों की फाइल हमारे| नाम, जी गौरव अवस्थी..| उन्नाव में रहते हो-जी हां| बायोडाटा पर निगाह गड़ाए हुए ही बोले- डेट आफ बर्थ? स्कूल में जन्म की तारीख 29 अगस्त 1965 की जगह 28 फरवरी 1966 लिखाई गई थी| हड़बड़ाहट में 28 की जगह मुंह से निकला- ’29 फरवरी’| ‘वेरी गुड..यह तो हर चार साल में आती है|’ यह वाक्य सुनते ही मन ने कहा- फंस गए बच्चू! अपने को तुरंत सुधारा भी लेकिन ‘गई भैंस पानी में’ वाला मुहावरा मन का दरवाजा खटखटाने लगा| मन में बिजली जैसी कड़कड़ाहट और ढेर सारे सवाल-क्या सोचेंगे? जो अपनी डेट ऑफ बर्थ सही नहीं बता सकता वह..आदि..आदि| कुछ और पूछताछ| फिर बोले, ठीक है! आप जाइए..|

वापसी का रास्ता इसी उधेड़बुन में कट गया| डर के मारे अपनी यह बेवकूफी पिताजी ( पंडित कमला शंकर अवस्थी) को बताई न भइया को| राहत थोड़े दिनों बाद तब मिली जब नियुक्ति का लेटर ले जाने का फरमान सुनील दुबे जी ने फोन पर सुनाया| तब मोबाइल नहीं लैंडलाइन ही हुआ करते थे| भागे-भागे लखनऊ पहुंचे| दुबे जी ने नियुक्ति का लेटर दिया| पद मिला- ट्रेनी स्टाफ रिपोर्टर| तनख्वाह ढाई हजार रुपए| ट्रैवलिंग और कुछ अन्य भत्तों को मिलाकर महीने की रकम पहुंच गई 3600 रुपए| महीने की यह आमदनी परिवार (पत्नी और दो बच्चों) पर खर्च के लिए पर्याप्त थी या नहीं, इसका अब तनिक भी एहसास नहीं लेकिन तब इस बात की खुशी बहुत अधिक थी कि परिवार का खर्च उठाने की कूवत ‘हिंदुस्तान’ ने दे दी थी| लखनऊ में जॉइनिंग देकर 7 सितंबर 1996 को रायबरेली पहुंचे| तब से अब तक हम हिंदुस्तान के-हिंदुस्तान हमारा| मेरे जीवन की हर धार का आधार हिंदुस्तान ही है| प्रोफेशनल हो या सामाजिक या पारिवारिक| हिंदुस्तान ने ही समाज में सम्मान से जीने, उठने-बैठने लायक बना दिया| 27 साल 6 महीने हिंदुस्तान में ही कटे| बहुत यादें हैं| क्या लिखूं-क्या छोड़ूं? उन पर फिर कभी| आज बस इतना ही-हिंदुस्तान-जिंदाबाद!

सेवा में संयोग ही संयोग! हड़बड़ाहट में जिस तारीख (29 फरवरी) का जिक्र इंटरव्यू के समय हुआ, वह लीप ईयर में आती है| 28 साल बाद लीप ईयर की उसी तारीख को सेवा से ‘मुक्ति’ मिलने का संयोग बना| यह कैलकुलेशन कुदरत ही लगा सकती है व्यक्ति नहीं| तनिक भी अंदाजा नहीं था कि गलती से जो तारीख मुंह से निकली, वह इस तरह ‘तवारीख’ बन जाएगी| नौकरी की शुरुआत संस्थापक संपादक सुनील दुबे जी के समय में हुई और समापन भी उसी नामराशि के सुनील द्विवेदी के संपादन में हो रही है| अपने यहां दुबे और द्विवेदी में ज्यादा कोई फर्क नहीं माना जाता| यह भी संयोग ही है कि ऑफिस का चार्ज भी इस नाम राशि के सुनील जी को सौंप दिया| बस! दुबे या द्विवेदी की जगह उनका सरनेम पांडेय है (फोटो संलग्न)| एक संयोग यह भी कि रायबरेली में ‘रूप भवन’ (जैन बिल्डिंग) में 1996 में दफ्तर खोला था| घूम फिर कर हिंदुस्तान का ऑफिस आजकल वहीं है| उस बिल्डिंग के उसी हिस्से से ‘हिंदुस्तान’ से विदाई भी मिली, जहां पहली बार दफ्तर के रूप में कदम रखा था| ऐसे संयोग सबके जीवन में नहीं आते| अपना एक नसीब यह भी है|

इन 28 वर्षों में बहुत कुछ बदला| हम भी बदले| हिंदुस्तान भी बदला और बदला अधिकारियों का मिजाज भी| कहने को बहुत कुछ है लेकिन कहूंगा नहीं| जो कहना था परोक्ष-अपरोक्ष रूप से नौकरी में रहते हुए कहा-सुना| अब इस पर कुछ भी कहना या लिखना, उन निकृष्ट या अधम लोगों में अपनी गिनती कराना होगा जो सस्ती लोकप्रियता के लिए झूठी-सच्ची बातें बताते या लिख देते हैं| अपन ऐसे नहीं, जो मीठा-मीठा गप कर जाएं और कड़वा-कड़वा थू..

पत्रकारिता के तकरीबन तीन दशक के इस दौर में हर तरह के अनुभवों से गुजरना हुआ| इन अनुभवों ने हमें सजाया-संवारा| सिखाया-पढ़ाया| बनाया-बढ़ाया| गिरे, उठे और चले..तो चलते ही रहे| बिना डरे| बिना थके| बिना रुके| अब थोड़ा विश्राम और फिर एक नए सफर पर जब तक शरीर है| श्वांस है|

जीवन में राह दिखाने और नजरिया निखारने वाले सभी वरिष्ठों को आदरपूर्वक प्रणाम और साथियों का हार्दिक आभार..

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