*वंदे मातरम् और बिस्मिल्लाह: एक भारत, जो सुरों में बसता है*
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की 20वीं पुण्यतिथि पर विशेष -:
“एक तरफ़ ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष, दूसरी तरफ़ बिस्मिल्लाह ख़ान की 20वीं पुण्यतिथि। एक ने मातृभूमि को शब्द दिए, दूसरे ने उसी मिट्टी को सुर। दोनों के बीच कहीं वह भारत बसता है, जिसकी पहचान उसकी सांझी संस्कृति है।”
किसी गीत की उम्र क्या होती है? जब उसके शब्द किताब के पन्नों से निकलकर किसी मुल्क की स्मृति में बस जाएँ, तो शायद उसकी उम्र वर्षों में नहीं मापी जा सकती और किसी कलाकार की उम्र? शायद वह भी जन्म और मृत्यु की तारीख़ों के बीच सीमित नहीं होती ख़ासकर तब, जब उसकी साँस से निकला एक सुर किसी देश की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाए।
आज ये दोनों स्मृतियाँ एक असाधारण मोड़ पर साथ खड़ी हैं।
देश इस समय ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की यह रचना 1875 में सामने आई और आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से गहरे जुड़ गई। इसी वर्ष 21 अगस्त को उस शख़्स को दुनिया से गए बीस वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिसकी शहनाई आज़ाद भारत की पहली सुबह की सबसे स्थायी सांगीतिक स्मृतियों में से एक बन गई – भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान। उनका निधन 21 अगस्त 2006 को हुआ था।
एक तरफ वंदे मातरम्, दूसरी तरफ बिस्मिल्लाह खान
दो शब्द, जिनकी धार्मिक-सांस्कृतिक उत्पत्तियाँ अलग दिखाई दे सकती हैं लेकिन भारत की कहानी शायद इन्हीं दोनों को एक ही वाक्य में सहजता से रख पाने की कहानी है और संभवतः बिस्मिल्लाह ख़ान की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का इससे बेहतर समय भी नहीं हो सकता।
क्योंकि वंदे मातरम् और बिस्मिल्लाह ख़ान का रिश्ता किसी एक कार्यक्रम, किसी एक रिकॉर्डिंग या इस दावे पर निर्भर नहीं करता कि उन्होंने अमुक दिन यह गीत बजाया था। उनका रिश्ता इससे कहीं अधिक गहरा है।
वह रिश्ता उस भारत की कल्पना से है, जिसमें मातृभूमि के प्रति प्रेम और ईश्वर की तलाश एक-दूसरे के विरोधी नहीं, एक ही सांस्कृतिक चेतना के अलग-अलग स्वर हो सकते हैं।
अगर शहनाई स्वयं वंदे मातरम् को कोई ख़त लिख पाती, तो शायद वह कहती –
प्रिय वंदे मातरम्,
लोग तुम्हें राष्ट्रगीत कहते हैं, लेकिन मैं तुम्हें इस देश की धड़कनों में सुनती हूँ। मैंने तुम्हें मंदिर की घंटियों में सुना है, किसी माँ की लोरी में, किसान की थकान में, गंगा के किनारे उठती सुबह में और उस प्रभात में भी, जब सदियों की पराधीनता के बाद भारत ने खुली हवा में अपनी पहली साँस ली थी। उस सुबह मैं भी वहाँ थी।
यह केवल कल्पना नहीं, हमारे इतिहास की एक गहरी सांगीतिक स्मृति की ओर संकेत है। 15 अगस्त 1947 को उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान को स्वतंत्रता के अवसर पर शहनाई वादन का गौरव मिला। बाद में 26 जनवरी 1950, भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर भी उन्होंने प्रस्तुति दी। भारत सरकार ने स्वयं उनके जीवन को भारत की सांझी संस्कृति और सांगीतिक परंपराओं का जीवंत रूप कहा है।
यहीं बिस्मिल्लाह ख़ान केवल एक महान संगीतकार से आगे निकल जाते हैं। वे एक विचार बन जाते हैं।
वह विचार यह कि भारतीयता को हमेशा परिभाषाओं में बाँधकर नहीं समझा जा सकता। कई बार उसे सुना जाना चाहिए। बिस्मिल्लाह ख़ान के जीवन में बनारस केवल एक शहर नहीं था। वह उनकी साधना की ज़मीन था। जिस शहनाई को कभी मुख्यतः मांगलिक अवसरों और सीमित सामाजिक सांस्कृतिक दायरों से जोड़ा जाता था, उसे उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित मंच तक पहुँचाया। नौ दशकों से अधिक की उनकी संगीत यात्रा में शहनाई और बिस्मिल्लाह का नाम लगभग एक दूसरे का पर्याय बन गया। भारत सरकार ने भी उनके योगदान को इसी रूप में रेखांकित किया और 2001 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
लेकिन उनकी असली विरासत शायद पुरस्कारों की सूची से भी बड़ी है। वह यह कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी से उस कृत्रिम दीवार को अनेकों बार मिटाया, जो हम अक्सर धर्म और संस्कृति के बीच खड़ी कर देते हैं। उनके लिए सुर की तलाश ही साधना थी।
इसीलिए भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में जारी वक्तव्य में उन्हें जाति और धर्म की बाहरी सीमाओं से ऊपर उठने की आवश्यकता की याद दिलाने वाला कलाकार और भारत की बहुलतावादी परंपरा का रूपक कहा गया था।
यही वह बिंदु है जहाँ वंदे मातरम् और बिस्मिल्लाह एक दूसरे से मिलते हैं।
वंदे मातरम् ने भारत को माँ के रूप में देखने की एक भावभूमि दी, एक ऐसी भूमि, जिसकी नदियाँ, खेत, हरियाली और धरती केवल भूगोल नहीं, भाव हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह रचना राष्ट्रीय चेतना और आत्मसम्मान की आवाज़ बनी और बिस्मिल्लाह ख़ान ने उसी मिट्टी को सुर में ढाला।
उनका भारत किसी भाषण में निर्मित भारत नहीं था। वह घाटों पर जागता था। गलियों से होकर गुजरता था। मंदिरों की ध्वनियों को सुनता था। मुहर्रम के मातमी सुरों की पीड़ा को पहचानता था और अंततः शहनाई की उस फूँक में समा जाता था, जहाँ सुनने वाले से उसका धर्म नहीं पूछा जाता सिर्फ़ यह पूछा जाता है कि क्या वह सुर उसके भीतर कहीं पहुँचा?
शायद इसीलिए 15 अगस्त 1947 की शहनाई का अर्थ केवल एक सांगीतिक प्रस्तुति नहीं था। एक नए देश को अपना संविधान अभी बनाना था। उसकी संस्थाएँ आकार ले रही थीं। विभाजन का ज़ख़्म ताज़ा था। भविष्य अनिश्चित था। ऐसे समय में एक मुसलमान फ़नकार की शहनाई स्वतंत्र भारत के उत्सव का हिस्सा बनती है।
इस दृश्य को आज, लगभग आठ दशक बाद, फिर से पढ़ने की ज़रूरत है क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनते, उसका एक ही पता होता है हम भारत के लोग।
वंदे मातरम् हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की ऐसी ही एक स्मृति है। बिस्मिल्लाह की शहनाई हमारी सांझी सांस्कृतिक स्मृति की वैसी ही एक आवाज़ और इसीलिए आज सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि हम बिस्मिल्लाह ख़ान को कितना याद करते हैं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उस भारत को भी उतनी ही शिद्दत से बचा रहे हैं, जिसकी आवाज़ बिस्मिल्लाह ख़ान थे?
किसी महान कलाकार को स्मारक दे देना आसान है। उसके नाम पर समारोह कर लेना भी आसान है। तस्वीर पर फूल चढ़ाना तो और भी आसान। मुश्किल है उस मूल्य को जीवित रखना, जिसका वह कलाकार प्रतिनिधित्व करता था।
अगर बिस्मिल्लाह ख़ान हमारे लिए सांझी संस्कृति का प्रतीक हैं, तो उनकी पुण्यतिथि केवल स्मरण का दिन नहीं हो सकती। वह आत्मपरीक्षण का दिन भी होना चाहिए।
हमें खुद से पूछना चाहिए कि जिस गंगा-जमुनी सांस्कृतिक संसार ने बिस्मिल्लाह जैसे कलाकार को जन्म दिया, क्या अगली पीढ़ी को हम उसका अर्थ समझा पा रहे हैं?
क्या नई पीढ़ी यह जानती है कि भारत की सांस्कृतिक ताक़त हमेशा एकरूपता में नहीं रही बल्कि अनेक आस्थाओं, भाषाओं, परंपराओं और ध्वनियों के साथ-साथ बहने में रही है?
इसीलिए शायद 2026 का यह संयोग असाधारण है।
एक ओर वंदे मातरम् के डेढ़ सौ वर्ष का उत्सव चल रहा है और दूसरी ओर बिस्मिल्लाह ख़ान की बीसवीं पुण्यतिथि।
एक ने कहा, मातृभूमि को नमन, दूसरे ने शायद जीवन भर बिना कहे यही बात अपनी शहनाई से कही। लेकिन दोनों के बीच कहीं वह भारत मौजूद है जिसे किसी एक धर्म, एक भाषा या एक पहचान में समेटा नहीं जा सकता।
इसीलिए शायद 2026 का यह संयोग असाधारण है। एक ओर वंदे मातरम् के डेढ़ सौ वर्ष हैं, दूसरी ओर बिस्मिल्लाह ख़ान की बीसवीं पुण्यतिथि। एक ने मातृभूमि को शब्द दिए, दूसरे ने उसी मिट्टी को सुर।
आज अगर शहनाई वंदे मातरम् से कुछ कह पाती, तो शायद बस इतना कहती –
“तुम केवल राष्ट्रगीत नहीं, इस देश की चेतना हो… और मैं उस चेतना की आवाज़।”
यही बिस्मिल्लाह ख़ान की सबसे बड़ी विरासत है — एक ऐसा भारत, जहाँ सुर किसी पहचान से पहले इंसान तक पहुँचता है और जब तक वह सुर सुनाई देता रहेगा, बिस्मिल्लाह ख़ान इतिहास नहीं, हमारी जीवित सांस्कृतिक स्मृति बने रहेंगे।
क्योंकि कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, वे पीढ़ियों तक सुनाई देती हैं।
– सविता आनंद
– लेखिका