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क्या है कार्बन क्रेडिट, जिसे Google भारतीय कंपनियों से खरीदेगा?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
17/01/25
in राष्ट्रीय, समाचार
क्या है कार्बन क्रेडिट, जिसे Google भारतीय कंपनियों से खरीदेगा?
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नई दिल्ली: भारत में कार्बन डाईऑक्साइड निष्कासन (सीडीआर) के लिए दुनिया की दिग्गज कंपनी गूगल ने वराह नाम के एक स्टार्टअप के साथ किया करार किया है. गूगल ने बताया है कि वह वराह स्टार्टअप से कार्बन क्रेडिट खरीदेगा. वराह भारी मात्रा में कृषि अपशिष्ट को बायोचार में बदलता है. बायोचार वास्तव में चारकोल का एक रूप है, जो वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड को हटा कर वापस मिट्टी में भेज देता है.

गूगल और वराह के बीच हुआ समझौता बायोचार से जुड़ा अब तक का सबसे बड़ा समझौता बताया जा रहा है. इसी बहाने आइए जान लेते हैं कि क्या है कार्बन क्रेडिट, जिसे खरीदने के लिए गूगल ने समझौता किया है.

ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन घटाने में इस्तेमाल

कार्बन क्रेडिट वास्तव में एक प्रकार का सिस्टम है, जिसका उपयोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाने या हटाने के लिए किया जाता है. कार्बन क्रेडिट को कार्बन ऑफसेट भी कहा जाता है, क्योंकि इसके लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जाती है. एक कार्बन क्रेडिट एक मीट्रिक टन कार्बन डाईऑक्साइड या अन्य ग्रीन हाउस गैस में इसके बराबर है. कार्बन क्रेडिट का अकसर कार्बन बाजार में कारोबार होता है. इसके व्यापार के लिए सबसे प्रसिद्ध है यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली.

टेक्नोलॉजी कंपनियां ऐसे करती हैं इस्तेमाल

टेक्नोलॉजी कंपनियां अपने परिचालन के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को घटाने के लिए कार्बन क्रेडिट का इस्तेमाल करती हैं. उदाहरण के लिए टेक्नोलॉजी कंपनी अपने बिजली के इस्तेमाल, कर्मचारियों की यात्रा या अन्य स्रोतों से होने कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए इसका उपयोग कर सकती हैं. इससे वे जलवायु परिवर्तन में अपना योगदान कम करती हैं. कुछ मामलों में टेक्नोलॉजी कंपनियां कार्बन क्रेडिट बेचकर राजस्व भी जुटाती हैं.

टेक्नोलॉजी की दुनिया की कई कंपनियां पर्यावरण पर पड़ने वाले अपने प्रभाव को कम करने की अपनी प्रतिबद्धता के लिए खुद कार्बन क्रेडिट खरीद रही हैं. जैसे फेसबुक ने साल 2020 तक कार्बन न्यूट्रल होने की प्रतिबद्धता जताई थी और अपने उत्सर्जन को घटाने के लिए साल 2011 से ही कार्बन क्रेडिट खरीद रही थी. गूगल भी साल 2007 से ही कार्बन क्रेडिट खरीद रही. इसका लक्ष्य है कि साल 2030 तक शत-प्रतिशत रीन्यूएवल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) से अपना संचालन करे.

ऐसे हासिल किया जाता

एक कार्बन क्रेडिट एक मीट्रिक टन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर होता है. किसी कंपनी के कार्बन क्रेडिट खरीदने का मतलब है, वह वायुमंडल में एक मीट्रिक टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित करने का हक खरीद रही है. खुले बाजार से कार्बन क्रेडिट खरीदा जा सकता है या फिर उत्सर्जन को घटाने वाले प्रोजेक्ट में निवेश करके इसे हासिल किया जा सकता है. कार्बन क्रेडिट को बेचने से मिलने वाला धन एक फंड में जाता है. इस फंड का उपयोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने वाले प्रोजेक्ट में किया जाता है.

इन प्रोजेक्ट में पेड़-पौधे लगाना, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को विकसित करना या फिर ऊर्जा दक्षता में सुधार करना हो सकता है. इस तरह से कंपनियां अपने उत्सर्जन को ऑफसेट कर धरती को नुकसान पहुंचाए बिना विकास जारी रख सकती हैं.

कार्बन क्रेडिट का भविष्य टेक्नोलॉजी क्षेत्र की कंपनियों के हाथों में है. ये कंपनियां लगातार अपने कार्बन फुटप्रिंट (कार्बन उत्सर्जन) कम करने और पर्यावरण के अधिक अनुकूल बनने के तरीकों को खोज रही हैं. इन कंपनियों के ऐसे कदमों से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन पर किसी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.

बायोचार बन सकता है सस्ता विकल्प

आमतौर पर कार्बन डाईऑक्साइड निष्कासन (सीडीआर) के तहत वायुमंडल और महासागरों में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड को हटाने के लिए महंगी तकनीक तो मौजूद है, जो सीधे हवा से जहरीली गैस सोखने में कारगर है. वहीं, पर्यावरण से कार्बन डाईऑक्साइड के समाधान के लिए बायोचार एक सस्ता विकल्प बन सकता है. भारत के खेतों से हर साल इतना अपशिष्ट निकलता है, जिससे पर्याप्त बायोचार उत्पन्न किया जा सकता है. इसका उपयोग 100 मिलियन टन से भी ज्यादा कार्बन डाईऑक्साइड सोखने में हो सकता है. वहीं, गूगल ने साल 2030 तक एक लाख टन कार्बन क्रेडिट खरीदने का लक्ष्य रखा है.

गूगल और वराह के बीच हुए समझौते के तहत भारत में सैकड़ों छोटे-छोटे किसानों से उनकी फसल का अपशिष्ट खरीदा जाएगा. रिएक्टर स्थापित कर इस अपशिष्ट को बायोचार में बदला जाएगा, जिससे सैकड़ों सालों तक कार्बन डाईऑक्साइड को अलग रखने में सहायता मिलेगी. उर्वरकों के विकल्प के रूप में खेतों में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. इसलिए इसकी सप्लाई किसानों को की जाएगी.

सरकार नियंत्रित करती है कार्बन क्रेडिट की खरीद-बिक्री

भारत में कोई भी नियम कंपनियों को क्रेडिट खरीदने के लिए बाध्य नहीं करता है. हालांकि, कार्बन क्रेडिट की खरीद-बिक्री सरकार द्वारा तय किए नियमों के तहत ही होती है. इसके अलावा सरकार ही यह भी तय करती है कि कौन सा उद्योग या कंपनी कितना उत्सर्जन कर सकती है. सरकार विभिन्न उद्योगों को यह भी बताती है कि वे कितना कार्बन उत्सर्जित कर रहे हैं. मानक से अधिक कार्बन उत्सर्जन करने पर कंपनियों/उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है.

कार्बन क्रेडिट के ये हैं लाभ

कार्बन क्रेडिट के जरिए एक ओर जहां कंपनियों को कार्बन के उत्सर्जन की अनुमति मिलती है तो दूसरी ओर इससे मिले धन का इस्तेमाल कार्बन को वायुमंडल से घटाने के लिए किया जाता है. कंपनियों और उद्योग जितना अधिक कार्बन उत्सर्जन करेंगे, उतना क्रेडिट खरीदना पड़ेगा. ऐसे में जाहिर है कि वे अपना उत्सर्जन घटाने की दिशा में पहल करेंगे. इससे वायुमंडल में खतरनाक गैसों की मात्रा घटेगी जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा. दूसरी ओर, कार्बन क्रेडिट से मिले धन का इस्तेमाल कर भी ऐसे उत्सर्जन से निपटने के उपाय किए जाते हैं. अगर कार्बन क्रेडिट पर कंपनियां ध्यान न दें और अनाप-शनाप उत्सर्जन करती रहें तो जाहिर है वायुमंडल में खतरनाक कार्बन की मौजूदगी बढ़ती जाएगी जो ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण बढ़ाने में सहायक होगा.

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