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जमीन खो चुके स्वामी प्रसाद मौर्य क्या अखिलेश को दिला पाएंगे बढ़त?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
28/07/23
in राज्य, समाचार
जमीन खो चुके स्वामी प्रसाद मौर्य क्या अखिलेश को दिला पाएंगे बढ़त?
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में धर्म की राजनीति के जरिए स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य ने बहुजन समाज पार्टी के काल से ही ओबीसी और दलित राजनीति की है। इस वोट बैंक में अपनी पहचान बनाई और बढ़ाई। मायावती के साथ रहते हुए उनके साथ दलित और ओबीसी के कई बड़े चेहरे भी जुड़ते गए। वर्ष 2017 के यूपी चुनाव के पहले जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने पाला बदला। बसपा से भारतीय जनता पार्टी तक का सफर तय करने के क्रम में उस ओबीसी-दलित नेताओं और वोट बैंक का साथ उन्हें मिला। लेकिन, 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जब उन्होंने भाजपा से समाजवादी पार्टी तक का सफर तय किया तो स्थिति बदलती दिखी। उनके करीबी नेता तो साथ चले गए, लेकिन वोट बैंक को पूरी तरह से भाजपा से निकाल कर सपा तक ले जाने में वे कामयाब नहीं हुए। अखिलेश यादव को वे उस प्रकार का लाभ नहीं दे पाए, जिस प्रकार की उम्मीद सपा अध्यक्ष चुनाव से पहले कर रहे थे। अब हालिया बयान भी उनका टेंशन बढ़ाने वाले हो सकते हैं। भाजपा सांसद हरनाथ सिंह यादव का तो कहना है कि चर्चा में रहने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य हिंदुओं के खिलाफ बयान दे रहे हैं। उनका यूपी में कोई जनाधार नहीं है।

यूपी चुनाव 2022 में स्वामी प्रसाद मौर्य अपने मनपसंद फाजिलनगर विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे। भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट पर सुरेंद्र कुशवाहा को उतारा। सुरेंद्र कुशवाहा ने इस चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्य को 22 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया। मतलब, मुकाबला कड़ा भी नहीं हुआ। आसानी से भाजपा ने इस सीट पर जीत दर्ज की। स्वामी प्रसाद मौर्य की हार ने समाजवादी पार्टी को झटका दिया। स्वामी प्रसाद मौर्य भी वोट बैंक की राजनीति में अपनी पकड़ ढीली होता साफ देख रहे थे। हार का कारण वे भाजपा के धर्म की राजनीति को ठहराते रहे। स्वामी प्रसाद मौर्य तो काफी समय तक हार से उबर नहीं पाए। फिर समाजवादी पार्टी ने उन्हें विधान परिषद भेजा। इसके बाद उन्हें हाशिए पर जाने का अहसास हुआ। स्वामी प्रसाद मौर्य ने तब धर्म की राजनीति पर हमला शुरू किया। बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर के रामचरित मानस पर दिए गए बयानों को उन्होंने आगे बढ़ाया। धार्मिक पुस्तक पर बैन लगाने की मांग कर दी। अब वे बद्रीनाथ पर बयान को लेकर चर्चा में हैं।

सपा ने हमेशा बयान से काटी कन्नी

रामचरित मानस में तुलसीदास के दोहों का जिक्र कर उन्होंने इसे दलित, आदिवासी, महिला और पिछड़ों का विरोधी करार दिया। इस पर बैन लगाने की मांग करनी शुरू कर दी। विवाद गहराने लगा तो समाजवादी पार्टी के भीतर उनके खिलाफ आवाज उठने लगी। हिंदू धर्म के खिलाफ उनके बयानों को बताया जाने लगा। विरोध की चपेट में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तक आए। पार्टी के भीतर हो रहे विरोधों को खत्म करने के लिए सपा अध्यक्ष ने नेताओं पर कार्रवाई कर दी। दो महिला नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया। लेकिन, पार्टी उनके बयानों से हमेशा कटती रही। अखिलेश यादव और शिवपाल यादव ने उनके बयानों को निजी बताया। हालांकि, स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बाद मामला फिर भड़का। स्वामी प्रसाद मौर्य धार्मिक स्थल, मठ, मंदिर, पुजारी, ब्राह्मण से लेकर अन्य मसलों पर हमलावर रहे हैं।

स्वामी मौर्य मजबूरी या जरूरी?

अखिलेश यादव की ओर से पार्टी के नेताओं को साफ संदेश दिया गया है कि सांप्रदायिक मसलों पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया या बयान देने से बचें। रामचरित मानस प्रकरण के बाद उनका संदेश आया था। लेकिन, यह संदेश स्वामी प्रसाद मौर्य पर लागू नहीं होता है। वह बदस्तूर बयान दे रहे हैं। रामचरित मानस प्रकरण पर अखिलेश के माय समीकरण का प्रभावी अंग यादव वोट बैंक के भीतर से नाराजगी सामने आई। इसके बाद भी स्वामी प्रसाद मौर्य पर सपा अध्यक्ष कोई लगाम लगा पाने में कामयाब नहीं हुए। इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश पीडीए की बात करते हैं, मतलब पिछड़ा दलित एलायंस। पिछड़ा के नाम पर उनके साथ यादव वोट बैंक भी जुड़ता है। माय में जब तक गैर यादव ओबीसी और दलितों का वोट नहीं जुड़ेगा, जीत का समीकरण तैयार करना संभव नहीं होगा। ऐसे में अखिलेश के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य गैर यादव ओबीसी और दलित वोटों को लाने वाले नेता के रूप में दिखते हैं। इसलिए, वे पार्टी के लिए जरूरी हैं।

यूपी में बदलता दिख रहा समीकरण

यूपी में स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर समीकरण बदलता दिख रहा है। भले ही वे दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश करते दिखते हैं। इसके लिए वे हिंदू मंदिरों को निशाने पर ले रहे हैं। बौद्ध धर्मस्थलों को तोड़कर हिंदू मंदिरों के निर्माण की बात कर रहे हैं, लेकिन दलितों के मामलों पर बोलने से भी वे बचते दिखते हैं। दरअसल, पिछले दिनों गोरखपुर के एक गांव में दबंगों ने दलित के गांव में घुसकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी। तीन को घायल कर दिया। ट्रैक्टर में अश्लील गाना बजाने का विरोध किए जाने पर इस प्रकार की कार्रवाई हुई। हत्या के आरोपी यादव जाति से आते थे। इस मामले में सरकार से ओर से कार्रवाई जा रही है। लेकिन, विपक्षी दलों की ओर से केवल बसपा सुप्रीमो मायावती का ही बयान सामने आया। उन्होंने सरकार से इस मामले में कार्रवाई की मांग की। लेकिन, दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश में लगे समाजवादी पार्टी या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य का कोई बयान नहीं आया। इस पर सवाल उठ रहे हैं।

यूपी चुनाव 2022 ने संकेत दिया कि मायावती के दलित वोट बैंक में जो बिखराव हुआ, उसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले में गया। वहीं, ओबीसी वोट बैंक के बिखराव को रोकने के लिए भाजपा ने सुभासपा और ओम प्रकाश राजभर को अपनी तरफ कर लिया। स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ जाने वाले पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता दारा सिंह चौहान भी भाजपा में वापसी कर चुके हैं। ऐसे में मंदिर- धर्मग्रंथों के मुद्दे पर स्वामी मौर्य को वोटों का प्रसाद मिलेगा, देखने वाली बात होगी।

क्या बनेंगे अखिलेश के ट्रंप कार्ड?

स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर समाजवादी पार्टी के कई नेताओं की नाराजगी दिखती है। एक तरफ अखिलेश यादव इन दिनों सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलते दिख रहे हैं। वहीं, स्वामी प्रसाद मौर्य के बयानों ने इस वर्ग में लगातार नाराजगी बढ़ाई है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या वे समाजवादी पार्टी के साथ दलित-ओबीसी वोट बैंक को जोड़ने में कामयाब होंगे। एक सीनियर नेता का कहना है कि दलित वोट बैंक को सपा के साथ लाना उतना आसान नहीं है, जितना सोचा जा रहा है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तो मायावती जैसी दलित वर्ग की सर्वमान्य नेता समाजवादी पार्टी के साथ थीं। उन्हें तो यादव जाति का वोट मिल गया। इस कारण वे 10 सीटों पर जीतीं। लेकिन, समाजवादी पार्टी 2014 की तर्ज पर 5 सीटों पर सिमटी रही। इसका बड़ा कारण दलित वोट बैंक का सपा की तरफ शिफ्ट नहीं होना रहा। ऐसे में स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान कहीं अखिलेश यादव के परंपरागत वोट बैंक को ही नाराज न कर दें, यह भी एक अंदेशा है। ऐसे में अखिलेश के ट्रंप कार्ड माने जा रहे स्वामी मौर्य उनकी परेशानी न बढ़ा दें।

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