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किधर झुके OBC मतदाता और कैसे दिला दी जीत?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
03/12/23
in राज्य
किधर झुके OBC मतदाता और कैसे दिला दी जीत?
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में ओबीसी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया. कांग्रेस पार्टी की ओर से राहुल गांधी लगातार हर प्लेटफॉर्म पर ओबीसी का मुद्दा उठाते रहे और मोदी सरकार पर हमले करते हुए सवाल दागते रहे. कांग्रेस इस बहाने मिशन विधानसभा बनाम लोकसभा भी चला रही थी लेकिन विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रथानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका अलग तरीके से काउंटर करते रहे. बिहार में जाति जनगणना और ओबीसी आरक्षण का मुद्दा भी इसी बीच सामने आया. कांग्रेस ने इसे भी एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया.

उधर प्रधानमंत्री मोदी ने पलटवार करते हुए कहा कि उनके लिए एक ही जाति है गरीबों की, किसानों की और दलित-आदिवासियों की. इस प्रकार पीएम समाज के एक बड़े तबके तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रहे. दूसरी तरफ पार्टी चुनावी मैदान में सोशल इंजीनियरिंग को साधने के लिए ओबीसी उम्मीदवारों को उतारती रही. यानी चुनावी मैदान में बीजेपी दो तरीके से कांग्रेस को काटने में लगी रही.

छत्तीसगढ़ में ओबीसी वोटर्स
सबसे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की बात कर लेते हैं. प्रदेश में कांग्रेस भूपेश बघेल को अपना सबसे स्टार मुख्यमंत्री मानती रही है, प्रदेश में विकास का चेहरा बताती रही और ओबीसी समाज के हितैषी के तौर स्थापित किया लेकिन चुनाव में बीजेपी 33 ओबीसी उम्मीदवारों को मैदान में उतार कर कांग्रेस की रणनीति पर हावी हो गई. चू्ंकि प्रदेश में करीब 43 फीसदी ओबीसी वोटर्स हैं, बीजेपी ने इन उम्मीदवारों को उतार कर इस बड़े वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश की. कोई हैरत नहीं बीजेपी ने कांग्रेस से ओबीसी की 22 सीटों पर कब्जा भी कर लिया.

मध्य प्रदेश में भी ओबीसी फैक्टर
उधर मध्य प्रदेश में भी ओबीसी फैक्टर बीजेपी के पाले में ही गया. राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में एक रैली में ऐलान किया था कि अगर उनकी पार्टी की केंद्र में सरकार बनती है तो ओबीसी की वास्तविक संख्या पता करने के लिए जाति आधारित जनगणना करवाएगी. कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी चेहरे शिवराज सिंह चौहान को परास्त करने के लिए चुनाव में 62 उम्मीदवारों को टिकट दिया था, पार्टी ने इससे पहले भी 2018 के चुनाव में 60 ओबीसी नेताओं को टिकट दिया था.

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में करीब 48 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं. कांग्रेस की रणनीति के बावजूद मध्य प्रदेश में बीजेपी को 320 में 160 से ज्यादा सीटें मिली हैं. इसके पीछे दो बड़े फैक्टर माने जा रहे हैं. एक सबसे बड़ा फैक्टर लाड़ली बहना योजना के माध्यम से बीजेपी को महिलाओं का काफी वोट मिला तो वहीं पार्टी ने 40 फीसदी ओबीसी उम्मीदवार मैदान में उतार दिये. इन दोनों फैक्टर ने प्रदेश में एंटी इंकम्बेंसी के बावजूद कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा.

राजस्थान में कौन सी रणनीति रही कामयाब?
कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में जिस तरह से भूपेश बघेल को ओबीसी के एक बड़े चेहरे के तौर पर पेश किया उसी तरह राजस्थान में भी अशोक गहलोत एक स्टार मुख्यमंत्री और बड़े ओबीसी चेहरे के तौर पर ख्यात रहे. लेकिन राजस्थान में केवल ओबीसी ही नहीं बल्कि कई और फैक्टर्स ने मिलकर रिवाज को कायम रखा. अशोक गहलोत तमाम बड़ी योजनाओं को लागू करके भी अपनी सरकार को बचा नहीं सके.

राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब प्रचार की कमान संभाली तो उन्होंने सीधे राजेश पायलट के साथ हुई अनदेखी का मुद्दा उठाकर गुर्जरों पर पासा फेंका. भले ही सचिन पायलट ने सामने आकर उनका खंडन करना चाहा लेकिन पीएम का मैसेज गुर्जर समाज तक पहुंच चुका था. इसके अवाला भ्रष्टाचार, अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच विवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों ने बीजेपी को फायदा पहुंचाया. प्रदेश में बीजेपी को 115 तो कांग्रेस को 69 सीटें मिली हैं.

 

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