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गामा विकिरणों से क्यों डरते हैं साइंटिस्ट, जो धरती को पल में कर सकती है खाक!

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
07/06/23
in समाचार
गामा विकिरणों से क्यों डरते हैं साइंटिस्ट, जो धरती को पल में कर सकती है खाक!
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नई दिल्ली : साठ के दशक में परमाणु हथियारों पर बैन तो लग गया, लेकिन सारे देश एक-दूसरे पर शक कर रहे थे. सबको लगता था कि कोई न कोई मुल्क छिपकर न्यूक्लियर भंडार बढ़ा रहा होगा. इसी बात को जांचने के लिए अमेरिकी एयर फोर्स ने एक सैटेलाइट लॉन्च की. इसमें ऐसे डिटेक्टर लगे थे, जो न्यूक्लियर टेस्टिंग के दौरान निकलने वाली गामा विकिरणों का पता लगा सकें. इसके नतीजों ने वैज्ञानिकों को भी डरा दिया.

अंतरिक्ष से आ रही किरणें

देशों का तो पता नहीं, लेकिन स्पेस से जरूर गामा विकिरण आ रही हैं. ये इतनी खतरनाक हैं कि यूनिवर्स में कहीं भी इनका ब्लास्ट धरती को मिनटों में भाप बनाकर रख देगा. जाहिर है कि स्पेस में तो कोई न्यूक्लियर टेस्टिंग नहीं हो रही, फिर ये रेज कहां से आ रही हैं? इसे समझने के लिए यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च की एक लैब में वही कंडीशन तैयार करने की कोशिश हुई, ताकि धरती पर खतरे का अंदाजा हो सके. इसमें दिखा कि अगर गामा-रे बर्स्ट (GRB) हुआ तो धरती का नामोनिशान नहीं बचेगा.

क्या हैं गामा किरणें
आगे बढ़ने से पहले एक बार गामा किरणों को समझते चलें. ये रेडियोएक्टिव एनर्जी है, जिसे यूनिवर्स की सबसे ताकतवर विकिरण माना जाता है. धरती पर न्यूक्लियर टेस्टिंग के दौरान गामा रेज निकलती हैं. इसके अलावा स्पेस में भी ये खतरनाक किरणें हर जगह हैं, जो टूटते हुए तारे से, सुपरनोवा में विस्फोट से या फिर ब्लैक होल से निकलती रहती हैं.

क्या है गामा रे का विस्फोट

ये बिग बैंग के बाद सबसे ताकतवर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक घटना है. इसकी पावर का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि सूरज करीब 10 अरब सालों में जितनी एनर्जी निकालता है, उतनी ऊर्जा GRB से सिर्फ 1 सेकंड में निकल सकती है. वैसे तो स्पेस में लगातार गामा रेज निकलती रहती हैं लेकिन इनके विस्फोट की सबसे करीबी घटना 12 अरब प्रकाश वर्ष दूर हुई है. नासा की स्विफ्ट सैटेलाइट ने इसे रिकॉर्ड करने में कामयाबी पाई. यूनिवर्स की ये अकेली ऐसी घटना है, जो इतनी दूरी से भी रिकॉर्ड की जा सकी. टूटते हुए तारे में इसे देखा गया.

कैसे सुपरनोवा से निकलती हैं विकिरणें

जब किसी बेहद विशाल तारे का न्यूक्लियर ईंधन खत्म हो जाता है, तब वो मरने लगता है. इस दौरान तारे के किनारे गिरकर खुद में ही समाने लगते हैं. इससे ब्लैक होल बनता है. इस बीच एक और बात होती है. गिरते हुए तारे के आसपास बहुत मजबूत मैग्नेटिक फील्ड बन जाती है, जो तारे के कुछ हिस्से को खत्म होकर ब्लैक होल में बदलने से रोक देती है. मैग्नेटिक फील्ड के जरिए ही यह हिस्सा लाइट की रफ्तार से स्पेस में बिखर जाता है.

सूरज के जीवनकाल जितनी एनर्जी इनसे 1 सेकंड में निकलती है

तारे के इसी टूटे हुए हिस्से में गामा किरणें होती हैं. ये टुकड़े बहुत गर्म और इतने ताकतवर होते हैं कि हरेक सेकंड में इससे सूरज के पूरे जीवनकाल जितनी एनर्जी का विस्फोट होता रहता है. इसकी चमक भी कई अरब प्रकाश वर्ष की दूरी से दिखाई दे जाती है. यही वजह है कि नासा ने इतनी दूरी से भी ऐसी एक घटना रिकॉर्ड कर ली.

क्या होगा अगर ये किरणें हमारी धरती से टकराएं?

ये सवाल एक्सपर्ट्स को भी परेशान करता रहा. चूंकि गामा ब्लास्ट इतना शक्तिशाली और भयंकर होता है कि अरबों प्रकाश वर्ष की दूरी से भी दिख जाता है, तो वैज्ञानिक मानते हैं कि इनका जरा भी पास आना धरती को तबाह कर देगा.

भाप बन जाएगी पृथ्वी

अमेरिकन फिजिकल सोसायटी की एक रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास के वैज्ञानिकों ने दावा किया कि अगर गामा रेज के विस्फोट की घटना धरती से 2 सौ प्रकाश वर्ष की दूरी पर होती है, और तारे का गर्म हिस्सा हमारे ग्रह से टकराता है तो मिनटभर या उससे भी कम समय में धरती पानी की बूंद की तरह भाप बन जाएगी.

प्रकाश वर्ष क्या होता है

अगर ये घटना मिल्की वे में होगी, तो धरती तो बाकी रहेगी, लेकिन उसमें मौजूद एक-एक जीवन खत्म हो जाएगा. यहां बता दें कि मिल्की वे हमसे 26 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर है. प्रकाश वर्ष वो दूरी है, जिसे हम स्पेस में चीजों का डिस्टेंस बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं. एक प्रकाश वर्ष में 9 ट्रिलियन किलोमीटर होते हैं. यानी उतनी दूरी, जितने हमें शून्य भी नहीं आते. इतनी दूर से भी गामा किरणें हमें भाप बना सकती हैं.

पहला सामूहिक विनाश इसी वजह से

वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर पहली सामूहिक तबाही टूटते तारे में हुए विस्फोट से पैदा गामा किरणों की वजह से मची होगी. लगभग 443 मिलियन साल पहले ये पहला प्रलय आया था. इसे एंड-ऑर्डोविसियन कहा गया. इस दौरान धरती से ओजोन लेयर का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भाप बन गया. इससे खतरनाक अल्ट्रावायलेट किरणें धरती पर आने और तबाही मचाने लगीं.

बर्फ बन गई पृथ्वी

साथ ही साथ इनकी वजह से ग्लोबल कूलिंग भी होने लगी. दरअसल गामा किरणों ने वातावरण में पाए जाते नाइट्रोजन और ऑक्सीजन को नाइट्रोजन ऑक्साइड में बदल दिया. ये वही भूरी गैस है, जो धुएं में होती है. सूरज को गहरे भूरे धुएं ने ढंक लिया और धरती पर जितना पानी था, सब बर्फ में बदल गया. इस दौरान पृथ्वी पर मौजूद करीब 86 प्रतिशत स्पीशीज खत्म हो गई थीं.

फिलहाल यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च इसे रीक्रिएट करने की कोशिश कर रहा है कि स्पेस से गामा रेज धरती के इतने करीब कब तक आ सकती हैं. और अगर वे मिल्की वे की दूरी तक भी पहुंच जाएं तो क्या धरती को बचाया जा सकेगा. हालांकि इनमें होने वाला विस्फोट इतना ताकतवर होता है कि लैब में अब तक इसे समझने में कामयाबी नहीं मिल सकी.

 

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