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पूर्वांचल साधने के बाद क्यों बढ़ी बीजेपी की मुसीबत?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
17/07/23
in राज्य, समाचार
पूर्वांचल साधने के बाद क्यों बढ़ी बीजेपी की मुसीबत?

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नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2024 से पहले ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुभासपा अब एनडीए के साथ आ गई है. सुभासपा का पूर्वांचल में खासा असर है. पूर्वांचल में 26 लोकसभा सीटें आती हैं, यहां पर निषाद पार्टी और अनुप्रिया पटेल की अपना दल सोनेलाल का पहले से बीजेपी के साथ गठबंधन है और अब राजभर के जुड़ने के बाद एनडीए का कुनबा और मजबूत हो गया है. बीजेपी ने पूर्वांचल का सियासी समीकरण तो साध लिया है लेकिन पश्चिमी यूपी अब भी सिरदर्द बना हुआ है. जयंत चौधरी अब भी विपक्षी खेमे के साथ दिखाई दे रहे हैं. वो बीजेपी के साथ आने को तैयार नहीं है.

बीजेपी ने यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है ऐसे में पार्टी उन सीटों का आंकलन कर रही है जहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा या फिर बहुत कम अंतर से जीत मिली थी. बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान पूर्वांचल में हुआ था, लेकिन सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल एस के साथ आने से एनडीए इस क्षेत्र में मजबूत स्थिति में आ गया है. ऐसे में बीजेपी की नजर अब पश्चिमी यूपी पर लगी हुई है. पश्चिमी यूपी को जाटलैंड कहा जाता है. यहां पर जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल का खासा प्रभाव है.

जयंत बढ़ाएंगे बीजेपी की मुश्किलें

सूत्रों के मुताबिक पश्चिमी यूपी को साधने के लिए बीजेपी की कोशिश है कि किसी तरह जयंत चौधरी को एनडीए खेमे में जोड़ा जाए. इसके लिए बीजेपी के दिग्गज नेताओं को जिम्मेदारी दी है जो जयंत से संपर्क कर उन्हें अपने खेमे में लाने की कोशिश करें. राजनीतिक गलियारों में इस तरह की चर्चा तेज है कि बीजेपी ने जयंत को एनडीए के साथ गठबंधन का ऑफर दिया है. लेकिन जयंत ऐसे तमाम कयासों को खारिज कर चुके हैं. फिलहाल जयंत बीजेपी के साथ आने को तैयार नहीं है.

2024 में जिस तरह से विपक्ष की गोलबंदी हो रही है उस लिहाज से बीजेपी के लिए एक-एक सीट बहुत जरूरी हो गई है. पश्चिमी यूपी में 27 लोकसभा सीटें आती हैं. 2014 में बीजेपी को यहां केवल तीन सीटों पर ही हार का सामना करना पड़ा था लेकिन 2019 में 27 सीटों में से 19 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली और आठ सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. मुरादाबाद मंडल की सारी सीटें सपा-बसपा ने जीती ली थी. इस गठबंधन में रालोद की भी हिस्सेदारी थी, ऐसे में अगर जयंत चौधरी अब भी विपक्षी खेमे के साथ रहते हैं यहां बीजेपी का गणित गड़बड़ाना तय है.

पश्चिमी यूपी में जाटों का वर्चस्व है. जयंत के साथ जाट, गुर्जर, राजपूत और मुसलमानों का वोट है. 2014 के बाद पश्चिमी यूपी में जाटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जुड़ गया है, लेकिन अब भी जाट समुदाय का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय लोकदल के साथ है. ये लोग वहीं वोट करेंगे जहां जयंत चौधरी रहेंगे. अगर रालोद बीजेपी के साथ आती हैं तो जाट वोटों में बिखराव होगा और इसका फायदा चुनाव में होगा.

पश्चिम में बीजेपी के लिए रालोद कितनी अहम है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2022 विधानसभा चुनाव में रालोद के सपा के साथ जाने पर अमित शाह ने ये तक कह दिया था कि वो गलत घर में जा रहे हैं. इससे उन्हें नुकसान होगा. यही नहीं उन्होंने अपनी पार्टी के जाट नेताओं से ये तक कहा था कि बीजेपी को रालोद से कोई परहेज नहीं है. वो जाकर जयंत से बात करें और अगले चुनाव के लिए उन्हें मनाएं. 2024 के चुनाव में अगर रालोद साथ आती है तो पश्चिमी यूपी में एनडीए एक बार फिर 2014 जैसा प्रदर्शन कर सकती है.

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