नई दिल्ली: सनातन, हिंदी हार्टलैंड और गाय पर विवादित कमेंट के साथ ही नॉर्थ-साउथ स्टेट जैसी बातें डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टी के लिए भले ही ज्यादा नुकसान करने वाली न हो, मगर इंडी गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस को बैकफुट पर ला देती है. इसके बावजूद चुनाव से पहले ऐसे मुद्दे क्यों उभरते रहते हैं?
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले सनातन की तुलना डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों से करने वाले उदयनिधि स्टालिन के बाद अब उनकी पार्टी डीएमके के सांसद डीएनवी सेंथिलकुमार एस ने लोकसभा में भाजपा पर हमला करने के लिए गाय से जुड़ा विवादित कमेंट कर डाला. हंगामे और विरोध के बाद सेंथिल कुमार के बयान के विवादित हिस्से को संसद की कार्यवाही से हटा दिया गया. साथ ही सेंथिलकुमार ने भी अपने बयान पर खेद जता दिया. इसके बावजूद विपक्षी दलों के इंडी गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस के सामने फिर से मुसीबत खड़ी हो गई. उदयनिधि ने भी मंगलवार को ही दोबारा कहा था कि वह करुणानिधि के पोते हैं और सनातन पर अपने विवादित बयान के लिए माफी नहीं मांगेंगे. भारतीय जनता पार्टी ने इसको लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर हमला बोला और सवाल किया है कि क्या वह अपने सहयोगी दल के नेताओं के विवादित बयानों से सहमत हैं?
सनातन, गाय, हिंदी और उत्तर-दक्षिण के राज्यों में फर्क करने से किसका नुकसान
डीएननवी सेंथिलकुमार एस ने लोकसभा में दिए अपने बयान में हिंदी हार्टलैंड और उत्तर-दक्षिण के राज्यों में अंतर का जिक्र और उनकी राजनीति की तुलना कर पुरानी बहस को ताजा कर दिया. भाजपा ने इसको लेकर भी कांग्रेस आलाकमान को घेरा है. वहीं, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावों से पहले हिंदी, सनातन, गाय और नॉर्थ-साउथ डिवाइड जैसी सियासी कवायद कई बार हो चुकी है. देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ा है. क्योंकि, डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए स्थानीय भावनाओं को उकसाने वाली ऐसी हरकत बेहद आम है. तमिलनाडु से बाहर उन्हें कोई राजनीति करनी नहीं है. साथ ही उनका एक तय वोट बैंक है जिसे उन्हें ऐसी बातों से मैसेज देते रहना है. मगर गठबंधन की राजनीति के दौर में देश के दूसरे राज्यों के उनके सहयोगी दलों के सामने बेहद असहज स्थिति हो जाती है. डीएमके नेताओं के सनातन के बाद हिंदीभाषी राज्यों, गाय और नॉर्थ-साउथ स्टेट को लेकर विवादित बयान से कांग्रेस समेत कई दल बैकफुट पर हैं. कांग्रेस नेताओं ने डीएमके नेताओं के बयान से पल्ला झाड़ लिया है. अधीर रंजन चौधरी, मिलिंद देवड़ा और कार्ति चिदंबरम समेत कई कांग्रेस नेताओं ने सेंथिल कुमार के बयान को निजी बताया और उसकी आलोचना की है.
डीएमके के बहाने इंडी गठबंधन और कांग्रेस पर हमलावर हुए भाजपा के तमाम नेता
डीएमके सांसद के गाय और हिंदी हार्टलैंड पर विवादित बयान का भाजपा के तमाम नेताओं ने जमकर विरोध किया. भाजपा नेता के अन्नामलाई, सीटी रवि, जीवीएल नरसिम्हा राव सबने डीएमके, इंडी गठबंधन और कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. भाजपा नेताओं ने इसे हेट स्पीच बताया और कहा कि यह विपक्षी गठबंधन के फ्रस्टेशन को दिखाता है. अनुराग ठाकुर ने कहा कि चुनाव नतीजे को देखकर कई दल गाली-गलौज पर उतर आए हैं. ठाकुर ने कहा, ‘कांग्रेस की सोच देश को बांटने वाली है. कांग्रेस को हिंदू और हिंदी से घृणा है. यही वजह है कि डीएमके सांसद के बयान पर सोनिया और राहुल गांधी ने चुप्पी साध रखी है.’ उन्होंने आरोप लगाया कि अमेठी की हार के बाद दक्षिण भारत में राहुल गांधी ने अपने बयान में उत्तर भारत के लोगों को नीचा दिखाने का काम किया था. इंडी गठबंधन के नेताओं की सोच हिंदू, हिंदी और सनातन को नीचा दिखाने की है. उन्होंने कहा कि कभी जातिवाद तो कभी क्षेत्रवाद फैलाने में जुटे कुछ लोग टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे.
देश में हमेशा धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक रहा है भावनाओं से जुड़ा गाय का मुद्दा
आइए, जानते हैं कि गाय का इतना धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व क्यों है? साथ ही राजनीति में क्यों बार-बार गाय को मुद्दा बनाया जाता रहा है? हिन्दू और उससे जुड़े हुए धर्मों जैसे सिख, बौद्ध, जैन की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गाय में देवी-देवताओं का वास होता है. इसलिए गाय समेत पूरे गोवंश को पावन माना जाता है. लोग गाय को माता कहते और इनकी पूजा की जाती है. देवीदत्त पटनायक के मुताबिक हिंदू और जैन धर्म में इस्तेमाल किए जाने वाले सारे धार्मिक प्रतीकों में गाय को सबसे पावन माना जाता है. प्राचीन भारत में आजीविका के लिए गाय को पालना जरूरी था. गाय का दूध, गोबर, गोमूत्र सब किसी भी परिवार को आत्मनिर्भर बना देती थी. किसानों के लिए खेत में हल और सामान ढोने के लिए गाड़ी चलाने के लिए बैलों की जरूरत रहती थी. इसलिए गोधन कहा जाता रहा है. गाय से जुड़े कई पौराणिक कथाएं है. एक में धरती को गाय बताया गया है. सभी ऋषियों ने देवताओं से गाय मांगी है. गाय की भक्ति और गाय की रक्षा हिंदू धर्म की सबसे बड़ी मान्यता है और गोहत्या सबसे बड़ा पाप. गाय का दान जीवन सबसे बड़ी धार्मिक जिम्मेदारी में एक बताया गया है. भगवान कृष्ण का नाम ही गोपाल है और वह ग्वाले रहे हैं तो भगवान राम के पूर्वज दिलीप की गाय की रक्षा की कथा बहुत प्रसिद्ध है.
गाय को लेकर काफी संवेदनशील है देश की राजनीति, क्या कहती है पशुधन जनगणना
ऐतिहासिक तौर पर विदेशी आक्रमणकारियों की सेना के आगे गाय को दौड़ाकर भारतीय राजाओं को छलपूर्व हराने की कहानी भी कही जाती है और 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सैनिकों के विरोध के तात्कालिक कारणों में एक हथियारों में गाय की चर्बी होने को बताया जाता है. राजनीतिक तौर पर कांग्रेस का चुनाव चिह्न गाय और बछड़े की जोड़ी को बदले जाने का एक कारण बैलेट पेपर पर मोहर लगाने से जुड़े अफवाह को भी बताया जाता है. चुनावी राजनीति में भाजपा हमेशा से गाय को लेकर संवेदनशील दिखने की कोशिश करती रही है. वहीं विपक्षी पार्टियों ने कई बार गोमांस के मुद्दे को अलग-अलग राज्यों की चुनावी राजनीति में भाजपा पर हमला के लिए इस्तेमाल किया है. गोरक्षकों की सख्त कार्रवाई को लेकर भी भाजपा पर हमले किए जाते रहे हैं. इस दौरान भारत की पशुधन जनगणना 2012 के मुताबिक देश में 4.8 करोड़ देसी गायें हैं. साल 2007 में यह संख्या 4.1 करोड़ थीं. वहीं इस दौरान विदेशी या वर्णसंकर (क्रॉसब्रीड) गायों की संख्या 1.4 करोड़ से बढ़तक दो करोड़ के आंकड़े को छूने लगी है.
