पाकिस्तान में भगत सिंह की फांसी के 92 साल बाद अब क्यों मचा हंगामा?

नई दिल्ली : पाकिस्तान में भगत सिंह की फांसी के 92 साल बाद हंगामा मचा है. 19 मार्च, 1931 को ब्रिटिश शासन के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में मुकदमा चला और उन्हें सजा सुनाई गई. पहले उम्रकैद की सजा सुनाई गई, फिर बाद में दूसरे मामले में आरोपी बनाते हुए फांसी की सजा सुनाई. इस पर वकीलों के एक समूह ने उनकी सजा को रद कराने के लिए लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.

याचिका के जरिए स्वतंत्रता संग्राम के नायक भगत सिंह को मरणोंपरांत सम्मानित किए जाने की मांग की गई. लाहौर की हाइकोर्ट ने भगत सिंह के मामले को दोबारा खोलने पर आपत्ति जताई है. याचिका को लेकर वकीलों के पैनल ने अपने तर्क भी दिए हैं.

दोबारा सुनवाई के लिए याचिकाकर्ताओं के 5 बड़े तर्क

प्राथमिकी में भगत सिंह का नाम नहीं: याचिका दाखिल करने वाले वकीलों के पैनल में शामिल एडवोकेट इम्तियाज राशिद कुरैशी का कहना है, अंग्रेज अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या को लेकर जो प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी उसमें कहीं भी भगत सिंह का नाम नहीं था.

बिना गवाहों के मौत की सजा सुनाई: पूरे मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीशों ने की. उन्होंने मामले से जुड़े 450 गवाहों को सुने बिना ही भगत सिंह को मौत की सजा सुना दी. इसलिए एक बार फिर उस मामले में सुनवाई की जरूरत है.

हर धर्म के लोगों से मिला सम्मान: याचिकाकर्ताओं का कहना है, भगत सिंह ने पूरे उपमहाद्वीप की आजादी के लिए संघर्ष किया था. लड़ाई लड़ी थी. हिन्दू-मुस्लिम हों या सिख, हर धर्म के लोग उनका सम्मान करते हैं. इसलिए मामले की सुनवाई की जानी चाहिए.

पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना भी करते थे सम्मान: लाहौर कोर्ट में दाखिल याचिका में साफ कहा गया है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी भगत सिंह का सम्मान करते थे. उन्होंने सेंट्रल असेंबली में अपने भाषण के दौरान 2 बार उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.

12 घंटे पहले दे दी थी फांसी, नहीं खा सके खाना: भगत सिंह को राजगुरु और सुखदेव के साथ लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी जानी थी. इसके लिए 24 मार्च, 1931 का दिन तय किया गया था. लेकिन उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ 12 घंटे पहले यानी 23 मार्च, 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर फांसी दे दी गई. वो खाना तक नहीं खा सके थे.

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने क्या तर्क दिया?

एडवोकेट इम्तियाज राशिद कुरैशी का कहना है कि लाहौर हाईकोर्ट ने शहीद भगत सिंह के मामले को दोबारा खोलने के लिए संवैधानिक बेंच के गठन पर आपत्ति जताई है. अदालत का तर्क है कि यह मामला अदालत की बड़ी बेंच की सुनवाई के योग्य नहीं है. उनका कहना है कि कोर्ट के आदेश के बाद लाहौर पुलिस ने अनारकली थाने के रिकॉर्ड खंगाले तो उन्हें वो एफआईआर मिली थी जो सैंडर्स की हत्या के बाद दर्ज की गई थी. एफआईआर उर्दू में दर्ज हुई थी, उसके लिखा था कि 17 दिसम्बर 1928 की शाम को 4 बजे दो अज्ञात बंदूकधारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. यह मामला IPC की धारा 302, 120 और 109 के तहत दर्ज हुआ था.

 

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