दुःख से पहली बार मिलवाया था तुम्हारी हंसी ने तुम्हारी उदासी ले गयी थी दर्शन की किताबों तक चालीस साल बाद भी स्पर्श का बीज -मन्त्र अजपा जाप- सा स्वचालित…
बेतार के तार बुनते सघन रिश्तों की बारीक चादर अदेखी उंगलियाँ रचती मखमली बेलबूटे अनमिली निगाहें फेंकती अवसादित रातों में तेज सर्च लाइट प्रामाणिक होता है हमेशा अनकहा ही अबोली…