पावस में खटराग बहुत है तुम ही इंतजार करते थे हम तो पहले ही कहते थे…

पावस में खटराग बहुत है तुम ही इंतजार करते थे हम तो पहले ही कहते थे पावस में खटराग बहुत है टपक रहा है घर का एक -एक  कोना- कोना…

दुःख से पहली बार मिलवाया था…तुम्हारी हंसी ने…

दुःख से पहली बार मिलवाया था तुम्हारी हंसी ने तुम्हारी उदासी ले गयी थी दर्शन की किताबों तक चालीस साल बाद भी स्पर्श का बीज -मन्त्र अजपा जाप- सा स्वचालित…

अतिशय राग बिखेर गया…आंसुओं का अंतहीन सिलसिला…

अतिशय राग बिखेर गया आंसुओं का अंतहीन सिलसिला मौन की घुटन भरी गुफा में पैर टिकाने नहीं आते आश्वस्त स्वर पथरायी आँखें बुनती हें अतीत के रुपहले ऊन से एक…

बेतार के तार बुनते सघन रिश्तों की बारीक चादर…

बेतार के तार बुनते सघन रिश्तों की बारीक चादर अदेखी उंगलियाँ रचती मखमली बेलबूटे अनमिली निगाहें फेंकती अवसादित रातों में तेज सर्च लाइट प्रामाणिक होता है हमेशा अनकहा ही अबोली…

जो नहीं है…वही है…कोई है…

जो नहीं है वही है कोई है जो शब्दों की रस्सी पकड कूद आया था कच्चे मन के अहाते में नंगे पैर खुल चुकी है रस्सी बिखर गयी हैं मात्राएँ…

उन्होंने मान लिया है मुल्क में सब ठीक है…

उन्होंने मान लिया है मुल्क में सब ठीक है होते रहना चाहिए धरनें प्रदर्शन लाठीचार्ज जम्हूरियत के लिए यह सब भी ठीक है गाजी मियां के सालाना उर्स की तरह…