आखिरी 19 मिनट… जब ISRO की भी कमांड नहीं लेगा चंद्रयान-3

नई दिल्ली: भारत का बहुप्रतिष्ठित मिशन चंद्रयान-3 अब अपनी मंजिल के करीब है. 23 अगस्त को शाम 6 बजकर 4 मिनट विक्रम लैंडर के चांद पर लैंड होने की उम्मीद है, इस समय में कुछ बदलाव भी हो सकता है जो कि परिस्थिति के हिसाब से होगा. जो मिशन चंद्रयान-2 पूरा नहीं कर पाया था, अब चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर से वो उम्मीद है. लेकिन इसरो की तमाम कोशिशों के बाद भी काफी हदतक यहां लक भी काम करेगा, क्योंकि जब विक्रम लैंडर चांद पर उतरने के बिल्कुल करीब होगा तब के आखिरी 15 से 20 मिनट में वह सभी फैसले वही कर रहा होगा और ISRO के हाथ में कुछ नहीं होगा. ये पूरा प्रोसेस कैसा होगा और किस तरह विक्रम लैंडर अपने आप फैसला लेगा, समझिए…

ISRO के मुताबिक, 23 अगस्त को शाम 6 बजकर 4 मिनट पर विक्रम लैंडर हो रहा होगा. अभी विक्रम लैंडर चांद की सतह से करीब 30 किमी. की दूरी पर है, बीते दिन ही उसने चांद की तस्वीरों को भेजा था. जो तस्वीरें आई हैं, उनके अध्ययन के आधार पर ही विक्रम लैंडर अपनी लैंडिंग की जगह को देखेगा और फिर चांद की सतह पर उतरने की कोशिश करेगा. हैरानी की बात ये है कि लैंडिंग की स्थिति में आने से पहले विक्रम लैंडर सॉफ्ट लैंडिंग वाले स्थान से करीब 700 किमी. दूर होगा. जब आखिरी फेज़ शुरू होगा, उस दौरान यह दूरी पूरी हो रही होगी.

कैसे लैंड करेगा चंद्रयान-3?

दरअसल, विक्रम लैंडर जब पूरी तरह से चांद की ऑर्बिट में आएगा तब उसके सतह की ओर गिरने या नीचे जाने की गति बेहद तेज होगी, जिसे कंट्रोल करना होगा. विक्रम लैंडर के हर पहिये के साथ जो थ्रस्टर्स (इंजन) लगे हैं, वह उल्टी दिशा में चलेंगे और इसकी स्पीड को धीमा करने की कोशिश करेंगे. 23 अगस्त को लैंडिंग के वक्त जब विक्रम लैंडर उतरने वाली जगह से 30 किमी. ऊंचा और 700 किमी. दूर होगा, तब वह 1.6 किमी. प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ रहा होगा. कुल 690 सेकंड के इस प्रोसेस में वह इस तूफानी रफ्तार से लैंडिंग वाली जगह पर पहुंचेगा और थ्रस्टर्स उसकी गति को काबू में ला रहे होंगे.

इस रफ्तार को 60 मीटर प्रति सेकंड तक लाया जाएगा और फिर विक्रम लैंडर को हल्का मोड़ने का काम शुरू होगा ताकि वह लैंडिंग की पॉजिशन में आ सके. जब लैंडिंग वाले स्पॉट से ये लैंडर सिर्फ 32 किमी. की दूरी और 7 किमी. की ऊंचाई पर होगा, तब डरावना पल शुरू होगा. क्योंकि चांद की इस ऑर्बिट में आने के बाद आखिरी के 20 मिनट में इसरो की ओर से विक्रम लैंडर को कोई सीधा डायरेक्शन नहीं दिया जाएगा, यहां पर विक्रम लैंडर अपने फैसले खुद ले रहा होगा. इसरो द्वारा इस लैंडर मॉड्यूल को इस तरह तैयार किया गया है कि वह ऐसे वक्त में अपने फैसले खुद ले सकेगा.

आखिरी 19 मिनट…

यानी विक्रम लैंडर लैंडिंग से पहले के 19 मिनट में जब इसरो से कोई कमांड नहीं ले रहा होगा, उस वक्त वह अपने अनुसार ही लैंडिंग वाली जगह की तलाश करेगा और सही जगह होने पर ही लैंड होगा. विक्रम लैंडर में कैमरे और सेंसर लगे हैं, जिनकी मदद से वह लैंडिंग की सही जगह की तलाश करेगा और हर पैर पर जो थ्रस्टर लगे हैं वह उसकी सही जगह पर लैंड करने में मदद करेंगे. जब आखिरी 10 मीटर की बारी आएगी तब सभी थ्रस्टर बंद होंगे और विक्रम लैंडर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा.

अगर एक बार सॉफ्ट लैंडिंग होती है, तब विक्रम लैंडर कुछ देर तक स्थिर रहेगा और आसपास उड़ रही धूल को छंटने का इंतजार करेगा. एक बार जब सब सेटल हो जाएगा, तब विक्रम लैंडर खुलेगा और उसमें से प्रज्ञान रोवर धीरे-धीरे उतरेगा, इस पूरी प्रक्रिया में करीब 3 घंटे का वक्त लग सकता है. क्योंकि इसमें सिर्फ 45 मिनट तो प्रज्ञान को रैंप से उतरने में ही लग जाएंगे, यह पूरी प्रक्रिया होने के बाद जब प्रज्ञान चांद पर आएगा तब जाकर वह अपना काम शुरू करेगा.

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