हिंदी की पहचान

  डा. रंजना वर्मा ‘रैन’ गोरखपुर     हिंदी मुझसे अक्सर पूछा करती है क्या भाषा की … अपनी कुछ सीमाएं हैं? या सीमाओं की अपनी ही बाधाएं हैं? भाव…

सोने जैसा स्वभाव है जिसका…

गौरव अवस्थी रायबरेली जीवन में जो उम्र कच्ची मानी जाती है, खेलों में वही रिटायरमेंट के लायक. आयु के ऐसे मानकों के कदम-दर-कदम विरोध का आभास कराने वाली लड़की सुधा…

भारत को भारतीय दृष्टि से देखने का प्रयास है ‘भारत-बोध’

लोकेन्द्र सिंह भारत में लेखकों, साहित्यकारों एवं इतिहासकारों का एक ऐसा वर्ग रहा है, जिसने समाज को ‘भारत बोध’ से दूर ले जाने का प्रयास किया। उन्होंने पश्चिम की दृष्टि…

धर्मनिष्ठा आज की सर्वोपरि आवश्यकता

विभिन्न क्षेत्रों में सत्ताधारी बने हुए अवाँछनीय व्यक्तियों को पदच्युत करने की बात ठीक है। जिनने अपने उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग किया वे इसी लायक हैं कि उनकी कलंक कालिमा…

दोस्ती : आदर्श और पतन की डगर

चन्द्रशेखर कुशवाहा हिन्दी विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज हमारी दोस्ती ऊफान पर थी। हममें न जाति पाति का कोई भेद था। न साम्प्रदायिकता की कोई रेखा थी। बेतकल्लुफ इतने कि सभ्यता…

पितृ दिवस विशेष : कारी तु कब्बि ना हारी- “कर्मयोगी तू कभी ना हारना” 

वसुन्धरा पाण्डेय यह पुस्तक एक सच्चे, सुलझे व आज्ञाकारी पुत्र द्वारा हीरो, पक्के दोस्त… प्रेरणास्रोत पिता के लिए लिखा गया एक दस्तावेज़ है, रयाल जी ने इसे रचकर यह साबित…

सप्रेजी की 150वीं जयंती पर विशेष : समान गुणधर्मी माधव राव सप्रे और महावीर प्रसाद दिवेदी

गौरव अवस्थी रायबरेली सरस्वती के साधक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन पंडित माधवराव सप्रे जी का जन्म 19 जून 1871 को मध्य प्रदेश के दमोह जिले के पथरिया गांव…

कोरोना महामारी : सवा सौ साल पुरानी पुनरावृत्ति, कहां हुआ विकास?

गौरव अवस्थी रायबरेली  रचत बिरंचि, हरि पालत हरत हर तेरे ही प्रसाद अब-जग-पालिके तोहिमें बिकास विश्व, तोहिमें बिलास सब तोहिमें समात, मातु भूमिधर बालिके दीजे अवलंब जगदंब! ना बिलंब कीजे करुणातरंगिनी,…

गाय को गले लगाने से उपचार ! 16 हजार रुपये दे रहे हैं 1 घंटे के लिए, कई जगह एडवांस बुकिंग

मनोज रौतेला की रिपोर्ट : दिल्ली : हिन्दू धर्म में गाय को पूजा जाता है लगता है अमेरिका के समझ आजकल आ रही है. आजकल कोरोना के चलते वहां पर…

भक्तिगाथा : विकारों से मुक्त, भक्तों के आदर्श शुकदेव

महर्षि पुलह के आग्रह से देवर्षि भी उत्साहित हुए और कहने लगे कि ‘‘शुकदेव तो गोलोक की अधिष्ठातृशक्ति पराम्बा भगवती श्रीराधा के लीला शुक थे। इसे प्रभु की आह्लादिनी शक्ति…