व्यंग्य : साहित्यिक मंच और पुरस्कार का गणित

सीमा ”मधुरिमा” लखनऊ आज डिजिटल युग है l जिससे सोशल नेटवर्किंग पर तमाम साहित्यिक समूह उग आये हैं l कितना समय ही लगता है इन समूहों को उगने में, न…

मैं नेता हूँ

सीमा “मधुरिमा” लखनऊ मैं नेता हूँ, तुम्हारे विस्वास, वफा के बदले बस छल ही देता हूँ, मैं नेता हूँ… न करना मुझसे उम्मीद वफ़ा की , मोहब्बत की क्योकि ये…

एक व्यंग : नेकी कर और फेसबुक पर डाल

सीमा”मधुरिमा” लखनऊ आज बहुत दिनों के बाद मीतू का अपनी एक अभिन्न सखी रीमा से मुलाक़ात हुई तो बातों का सिलसिला चल निकला ! मीतू ,” कैसी हो रीमा, शुक्र…

एक व्यंग्य… देवलोक की बैठक

“मधुरिमा” लखनऊ देवलोक में खलबली मची हुई थी… भगवान विष्णु बड़े परेशान सा चहलकदमी करते हुए भगवान शंकर के पास पहुँचे और बड़े ही गंभीर मुद्रा में बोले …जय श्री…

ज़िंदगी ठहरी हुई….(कविता)

ज़िंदगी ठहरी हुई दर्पण में रात की छवि कुछ गहरी हुई जिंदगी ठहरी हुई.. तेज़ तीखे अंधड़ों में शाख पर इक नीड की प्रहरी हुई जिंदगी ठहरी हुई.. आँख सूजी…

‘मेरा जीवन, मेरी रचना’

कनिका जैन काउंसलर थैरेपिस्ट कोच व हीलिंग प्रैक्टीशनर पति व पुत्र के साथ नई दिल्ली में निवास यह ब्रह्मांड बड़े विचित्र तरीके से कार्य करता है। जब हम खुले रूप…

वो मडोना…आती ख्वाबों में…

मडोना आती ख्वाबों में… लुभाती रही कोई मडोना ख्वाबों में … और मैं भूल अपना अस्तित्व अक्सर ही पीछा करता रहा उन ख्वाबों का — अर्धांगिनी चारदीवारी के भीतर निभाती…

वो रेल की पटरी और खौफनाक मंजर…

रेल की पटरियों पे मजदूरों की छत-विक्क्षत लाशें और उन लाशों के पास कुछ गोद वाले दुधमुँहे बच्चे भी थे जो जीवित थे वो मन्जर असहनीय था बस उसी वीडियो…

प्रवास : आशियाने की तलाश

प्रज्ञा शालिनी भोपाल मध्यप्रदेश खोदने वाले पहाड़ छाँटने वाले चट्टान बनाने वाले ऊँची इमारतें साफ़ करने वाले तलहटी सुना किसी ने , आज चींटी बन चुके हैं अपना घर तलाश…

गांव : खींच लाती है यहां की खूबसूरती

दीपशिखा गुसाईं को फाउंडर “अपनत्व” समाज सशक्तिकरण केंद्र देहरादून (उत्तराखंड) लोग कहते आज गांव रहे ही कहाँ क्योंकि जब वहां गांववाले ही नहीं तो गांव कैसा l पर किसने कहा…