“लोकतन्त्र के हत्यारे मुझे ठीक नहीं जान पड़ते! “क्यों? “वे बेचारे बार-बार हत्या करते हैं, और लोकतन्त्र हर बार जिन्दा हो जाता है! अब बताइए भला, ये भी कोई हत्या…
“लेखक हैं?” “जी।” “क्यों, अब्बा लेखक थे?” “नहीं।” “फिर आप लेखक कैसे हुए?” “अब्बा बनाकर!” “मतलब?” “मतलब यह कि लेखक होने के लिए मैंने एक लेखक को अब्बा बनाया।” “वाह!!…
“सैर कर दुनिया की ग़ालिब जिन्दगानी फिर कहां! जिन्दगानी ग़र रही तो, नौजवानी फिर कहां!!” इसी के साथ हम शुरुआत करेंगे बंबई नगरी के वैज्ञानिक विश्लेषण का। बंबई शब्द का…
आनंद अकेला भोपाल। आखिरकार मप्र सरकार के जनसम्पर्क मंत्री पीसी शर्मा ने लघु और मध्यम समाचार पत्र-पत्रिकाओं की लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान करते हुए पुनर्निरीक्षण…