मौन : मौन मुखर प्रश्न मेरे उत्तर विमुख हुए जाते हैं स्याह सी रात के साए आ उन्हें सुलाते हैं

-मौन- मौन मुखर प्रश्न मेरे उत्तर विमुख हुए जाते हैं स्याह सी रात के साए आ उन्हें सुलाते हैं नदिया चुप सी बहती है चांदनी मौन में निखरती है अंतर्मन…

“बेटी” कोख कहती मेरी मैंने तो संतान जने हैं बेटा बेटी कहकर तुमने ये कैसे ताने बुने हैं

बेटी कोख कहती मेरी मैंने तो संतान जने हैं बेटा बेटी कहकर तुमने ये कैसे ताने बुने हैं सींचा है रक्त से दोनों को ही मैंने नौ मास रात दिन…

–सभी समस्या का हल स्वयं में है–

–सभी समस्या का हल स्वयं में है– इस संसार में प्रत्येक मनुष्य के पास जब विकट समस्या आती है ,तब समस्या अकेले नहीं आती है ,समस्या और समाधान दोनों साथ…

वश में जो  होता यह मन। उड़ आता बन कर खंजन।

वश में जो  होता यह मन। उड़ आता बन कर खंजन। वाणी में शहद घोलता तोल मोल शब्द बोलता कभी दुखी कभी खुशगवार  बन कर ज्यों पवन डोलता जीवन के …

देश-दुनिया में हिन्दी का विस्तार

लोकेन्द्र सिंह (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं) वैश्वीकरण के इस दौर में हिन्दी का विस्तार और प्रभाव पूरे विश्व में देखने को मिल…

“तनाव” जी हाँ ये शब्द आज हर किसी के साथ यूँ जुड़ चुका मानों शरीर का अभिन्न अंग हो-(लेख)

“तनाव”          जी हाँ ये शब्द आज हर किसी के साथ यूँ जुड़ चुका मानों शरीर का अभिन्न अंग हो,,, इसके बिना हम एक कदम न चल…

“हिमालय दिवस पर “हिमालय” –(लेख)

“हिमालय दिवस “ “हिमालय” इस शब्द में ही कितना सुकूँ और खूबसूरती छुपी है,,इसी एक शब्द के इर्द गिर्द हमेशा अपना अस्तित्व खोजती रही हूँ,,इससे इतर स्वयं की कभी कल्पना…

सामाजिक समरसता के कथाकार प्रेमचंद्र

श्री कृष्ण यादव, प्रतापगढ़ परास्नातक छात्र, हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय कविता, कहानी और वर्तमान विषय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन प्रेमचंद सिर्फ साहित्यिक प्राणी ही नहीं थे, बल्कि उनकी कलम…

मां का जीवन

मां कभी रोती नहीं थी, कभी झगड़ती नहीं थी, कभी ज़िद नहीं करती थी,  कभी अड़ती नहीं थी, मां तो सतयुग आरंभ वाले दिन ही पैदा हुई थी, धरती पर…

शब्दों की कलाबाजी

कुमार मंगलम रणवीर परास्नातक,   काशी हिंदू विश्वविद्यालय       सामने से आते साहब ने रोबदार आवाज मे पल्ले झाड़ते हुए कहां आज का कवि वाहवाही लूटने वाला जीव हैं…