आखिर कब थमेगा लाल आतंक का खेल!

रायपुर : छत्तीसगढ़ में लाल आतंक का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। लगातार जवानों और नक्सलियों को लेकर इन इलाकों पर मुठभेड़ जैसी घटनाए सामने आती रहती है। सरकार जो भी आती है बातचीत करके मसला हल करने की मुहीम होती है लेकिन नक्सलियों के न इरादे बदलते हैं न ही नक्सलगढ़ के इस क्षेत्र में गोलियों की आवाज थमने का नाम लेती है। जवानों, आदिवासियों और नक्सलियों के खून से छत्तीसगढ़ के बस्तर की धरती हर रोज लाला होती रहती है।

कब थमेगा लाल आतंक का खेल

नक्सलियों की लड़ाई और बस्तर में यह खूनी जंग कब थमेगी यह तो कोई नहीं तय कर सकता है। हर बार सरकार नक्सलियों से चर्चा कर हथियार डालने और इस लड़ाई को खत्म करने की बात करते हैं। लेकिन न तो नक्सली बंदूक रखते हैं न ही  अपनी संपूर्ण मांग पर का चिट्ठा सरकार को देते हैं। लगातार नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर सराकर के मुहीम के साथ कुछ आते जरूर है लेकिन माओवाद के इस गढ़ में गोलियों की आवाज और बम का धमाके की झनझनाहट नही रुकती है। नक्सलियों की मांगों को लेकर कई तरह की बाते सामने आती है। कि क्या नक्सली ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में हो रहे विकास के खिलाफ हैं, या फिर नक्सली अच्छी शिक्षा का विरोध कर रहे है। खैर सभी के अलग-अलग तरह के तर्क है। लेकिन जमीनी हकीकत में वर्तमान में आखिर किन मुद्दों पर माओवाद फल-फूल रहा है इस बात की सच्चाई शायद कोई नहीं जानता है।

बीते मंगलवार को नक्सलियों कैंप में किया अटैक

छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा से सटे टेकुलगुडम गांव में पुलिस कैंप के विरोध करते हुए नक्सली के द्वारा बड़ी संख्या में सर्चिंग पर निकल जवानों पर गोलीबारी कर दी। इस मुठभेड़ में 3 जवान शहीद हो गए और 14 घायल हैं। वहीं इससे पहले इसी कैंप में साल 2021 में हमला हुआ था। उस वक्त नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में 20 से ज्यादा जवान शहीद हो गए थे।

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